COVID-19  : विश्व की महाशक्तियों का आत्मसमर्पण 

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दो टूक 

अजित सिंह राठी की कलम से

एक कहानी में पढ़ा था कि मनुष्य परिस्थितियों का दास होता है, कैसे होता है आज देख भी लिया। तमाम वो मुल्क़ जो अपनी सैन्य शक्ति और वैज्ञानिक प्रयोग के बल पर सुपर पावर बन गए, वो मुल्क़ जो दुनिया का सिकंदर बनने का ख़्वाब पूरा करने की फ़िराक़ में रहते हैं, आज अपने गुनाहों की सजा भुगत रहे हैं। अपनी कुछ गलतियों की वजह से प्रकृति के प्रकोप से बचने के लिए छुपते घूम रहे हैं। वो लोग जो अपनी ताक़त के अहंकार में चूर थे आज असहायों और लाचारी का जीवन बशर करने के लिए विवश है। खुद को शहंशाह समझ बैठे आज फ़रियाद लिए दरबदर है। एक ही झटके में चीन के वुहान शहर से निकले एक “कोरोना” ने दुनिया के सारे योद्धाओं के शौर्य को धूल चटाकर अपना शासन स्थापित कर दिया। दुनिया का दारोगा और महाशक्ति जैसे शब्दों से अलंकृत अमेरिका आज टकटकी लगाए आसमान की तरफ इस उम्मीद के साथ देख रहा है कि शायद कोई दैवीय शक्ति ऊपर से आये और राहत दे। जर्मन जैसे देश का वित्त मंत्री सुसाइड कर लेता है। दुनिया को आंख दिखने वाला चीन और बम बरसाने के लिए मशहूर उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग तो जैसे किसी सख्त मिज़ाज़ हेड मास्टर की क्लास में अनुशासित बच्चों की तरह प्रारंभिक शिक्षा की किताब खोले बैठे हो। अब न कहीं सोमालिया के समुद्री लुटेरों द्वारा जहाजों को लूटने की खबर आती है और न ही इस समय किन्हीं दो देशों के बीच का सरहद विवाद का शोर सुनाई देता है। अब ना भारत में पाक समर्थित आतंकवादी घुसते हैं और न धारा 370 हटाने का विरोध है, एनआरसी और CAA भी अब कोई खास मुद्दा नहीं रहा। यहाँ ये सब बताना इसलिए जरुरी है कि इंसान खुद को जितना ताक़तवर समझ लेता है वो कोरे मुग़ालते के अलावा कुछ नहीं होता।     

अजीबोगरीब दौर है। ऐसा लगता है कि दुनिया शून्य प्रहर से गुजर रही है। ताक़तवर लोग कोरोना के कहर से भूमिगत है, अजीब सी ख़ामोशी बिखरी पड़ी है, मंदिरो से आरती का संगीत और मस्जिदों से अज़ान की आवाज अब नहीं आती है। शिवालयों के मुख्य द्वार पर ताले लटके हैं। सूनी सड़कों पर सूखे पत्तों की सरसराहट और बेवक़्त की बूंदाबूंदी अपनी तरफ थोड़ा ध्यान तो खींचती है लेकिन यह सिलसिला बहुत देर तक नहीं चलता। सुनसान सड़कें, बाजार में दुकानों के बंद शटर इस बात की गवाही दे रहे हैं कि संभल जाओ वर्ना जिंदगी जहन्नुम बनने में देर नहीं लगेगी। बेतहाशा भीड़, अनियंत्रित यातायात, व्यवस्था बनाने को दौड़ते पुलिकर्मी और उलझते लोग, मगर आज कुछ भी नहीं। महानगरों की सड़कों पर पसरे सन्नाटे को तोड़ती एम्बुलेंस और पुलिस वाहनों के सायरन भी अब थके थके से लगने लगे है। हर शहर की आँखों में डर और दहशत साफ़ झलक रही है। पूरी दुनिया एक ट्रॉमा में तब्दील हो गयी है। देहरादून में घंटाघर पर लगे घंटे की आवाज कभी पास से भी सुनी नहीं थी अब पांच सौ मीटर दूर सुनाई दे रही है। हर घंटे यह घडी बताती है कि तुम भले ही घर में कैद हो लेकिन मैं अपनी रफ़्तार से चल रही हूँ। शहर में पुलिस है, स्वास्थ्यकर्मी है, पत्रकार है और वीरान सड़कों पर इधर से उधर दौड़ते गलियों के वो आवारा कुत्ते हैं जिनका इंसान की करतूतों की वजह ने निकलना दूभर हो गया था। अच्छा हुआ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को लॉक डाउन कर दिया और हम जनाजों के जलसे देखने से बच गए। देहरादून से हरिद्वार की तरफ निकलो तो नेशनल हाईवे पर बारह सिंघा जैसे वन्यजीव मस्ती के साथ विचरण कर रहे है। ऐसी चिड़ियाएं चहचहा रही है जो पहले नहीं देखी। दूरदर्शन पर रामायण और महाभारत जैसे पौराणिक धारावाहिक शुरू हो गए हैं, लगता है हम खुद तीन दशक पीछे चले गए है और जिंदगी रिवर्स गियर में है। 

US President Donald Trump

इस वक़्त बच्चों के दाखिले की प्रक्रिया से देश भर के स्कूल गुलजार रहते थे, एक महीने की क्लास चलने के साथ ही गर्मी की छुट्टियों में घूमने के लिए देश विदेश में मनपसंद शहर की बुकिंग का सिलसिला भी चल रहा होता, ट्रेवल एजेंसी खास प्लान बना रही होती और एयरलाइन्स नए सिरे से तैयारी कर रही होती, लेकिन गर्मी की छुटियों को तो भूल ही जाइये। सीज़न शुरू होने वाला है और देश दुनिया के प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों पर होटल और रिसॉर्ट्स में ख़ामोशी पसरी है। उत्तराखंड में गढ़वाल की आर्थिक रीढ़ चार धाम यात्रा का क्या होगा किसी को खबर नहीं है। यात्रा के लिए बुक तक़रीबन दस हज़ार बसों की बुकिंग रदद हो चुकी है, अब कोरोना रहे या जाय यात्रा तो “गयी”। पहली बार कोरोना की दहशत के साये में चारों धाम के कपाट खोले जायेंगे वो भी बगैर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के। प्रकृति के इस गुस्से के प्रभाव बाद तक देखने को मिलेंगे। उत्तराखंड और बिहार के साथ ही पूर्वी उत्तर प्रदेश में रिवर्स पलायन की शुरुआत हो चुकी है, हजारों लाखों लोग वापस लौट रहे हैं, अपने घर आना चाहते हैं भले ही भूखे रहे। जो कभी अपने पुश्तैनी घर की दहलीज़ पर त्योहारों में दिया जलाने तक नहीं आते थे उनके भीतर भी अपनी मिटटी के प्रति मोहब्बत उमड़ पड़ी है। ये मज़बूरी का ही सही लेकिन रिवर्स माइग्रेशन है। घर लौटने का आलम दिल्ली में देख लो, हजारों नहीं लाखों लोग बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश स्थित अपने पुश्तैनी घर के लिए पैदल ही निकल पड़े, कैसे जायेंगे सैंकड़ों किलोमीटर पैदल। लेकिन डर चीज ही ऐसी है साहब। डर के आगे जीत है, ये डायलॉग फिल्मों के लिए तो ठीक है लेकिन जब हालात बेक़ाबू हो तब बहुत बुरा लगता है। लोग बड़ी संख्या घर लौट रहे है, रिवर्स माइग्रेशन हो रहा है। जब ये दौर खत्म होगा तब कुछ लोग अपने काम के लिए फिर पलायन करेंगे और कुछ के कदम ठिठकेंगे जरूर। उनके लिए सम्बंधित राज्यों की सरकारों को स्वरोजगार का इंतज़ाम करना पड़ेगा। ख़ासतौर पर बिहार के लोग अब देर से लौटेंगे। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की इस मानव शक्ति को जो हेय दृष्टि से देखते थे, दुतकारते थे, उनमें से एक प्रतिशत भी ऐसे नहीं हैं जो अपना घर निर्माण करने के लिए खुद नींव में एक ईंट भी रख सकते हो। आर्थिक रूप से देश बहुत पीछे चला गया है, व्यापारिक, वाणिज्यिक संसथान बंद है, कारखानों की कल कल करती मशीनें शांत है, नौकरी व्यापर सब बंद है, टेक्स वसूलने वाले खली बैठे हैं, ऐसा लगता है सब कुछ ठहर गया है और इस ठहराव की बानगी तब दिखेगी कोरोना के बंद के दौरान का जीएसटी कलेक्शन आएगा। 

germany chancellor

यदि यह दौर लम्बा चला तो जीएसटी के घटने, कई सालो तक रोजगार और नए व्यापर के अवसर कम होने की सम्भावना होगी।राज्यों को मिलने वाली सब्सिडी केंद्र बंद कर देगा, पोषित योजनाओ में 90:10 के अनुपात को उल्टा कर दिया जायेगा और सीमित संसाधन वाले राज्य इसका शिकार होंगे।  तमाम तरह के सन्देश सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहे हैं, लोग बता रहे है कि इस समय हमने क्या बचाया है। बड़ी मात्रा में पेट्रोल डीज़ल बचा लिया है, प्रकृति को स्पेस दिया है, फुर्सत में सो रहे है, परिवार के साथ समय बिता रहे है, बुरी आदतें सुधर रही है, महसूस कर रहे है कि जान है तो जहान हैं, शोरशराबा खत्म हो गया है, पेड़ पौधे समेत तमाम तरह की वनस्पति और पृथ्वी स्वस्थ हो रही है, प्रदूषण न्यूनतम स्तर पर है, अपराध और अपराधियों की जड़े उखड गयी है इत्यादि। इन बातों को सोचकर खुश हो रहे है और इन्हें बिगाड़ा भी इस आदमजात ने ही था। देश में मेडिकल इमरजेंसी लगी है, लाखों लोग सिस्टम की निगरानी में हैं, काफ़ी लोगो की डेथ हो चुकी है, मरने वाले मरते रहेंगे और कुछ उनकी गिनती करने का काम करते रहेंगे, जो योगदान दे सकते है वो बखूबी दे रहे है। वक़्त बहुत बुरा है, मुश्किल हालात है लेकिन इस दौर को सबक के रूप में लेना होगा अन्यथा प्रकृति ऐसे निर्णय लेती रहेगी। बस समय रुकता नहीं है चलता रहता है ये बात ही राहत देती है। 

Spain

लॉर्ड कृष्णा से अर्जुन ने पूछा कि भगवन एक ऐसी पंक्ति लिख दीजिये जो खुश हो वो दुखी हो जाय और जो दुःख में उसके चेहरे ख़ुशी की उम्मीद छा जाय,लॉर्ड कृष्णा ने लिखा “ये वक़्त भी गुजर जायेगा”इस पंक्ति को पढ़कर बहुत खुश व्यक्ति दुखी हो जाता है और बहुत दुखी प्राणी खुश हो जाता है। हम भी हिम्मत रखते है क्योंकि ये वक़्त भी गुजर जायेगा, लेकिन हमें बहुत कुछ सिखाकर जायेगा।  

इंतज़ार पूरा, अभी बहुत कुछ अधूरा 

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दो टूक 
अजित सिंह राठी की कलम से 

देहरादून से ढाई सौ किलोमीटर से भी ज्यादा दूर अपने हक़ में कोई फैसला होने के इंतज़ार में गैरसैण की आँखे भी पथरा सी गयी थी, लेकिन अब शायद गैरसैंण “ग़ैर” ना रहे। शायद अब पलायन रुके और भूतिया गांव आबाद हो। इस राज्य ने बीस बरस की उम्र में नौ मुख्यमंत्री देखे लेकिन पौड़ी जिले के खैरासैंण गांव निवासी मौजूदा मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने आज गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाकर अपना लम्बा सियासी सफर भी पूरा किया। यह अभी तक का त्रिवेंद्र का सबसे बड़ा राजनीतिक फैसला लिया। गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित करके त्रिवेंद्र इस राज्य में अपनी राजनीतिक हैसियत में भी जबरदस्त इज़ाफा भी कर गए। यह फैसला त्रिवेंद्र के राजनीतिक करियर में सबसे महत्वपूर्ण माना जायेगा। इस फैसले को उन्होंने राज्य के उन आंदोलनकारियों को समर्पित किया जिन्होंने राज्य के गठन के लिए लड़ाई लड़ी और बलिदान दिया। जब विजय बहुगुणा ने 2013 में गैरसैंण में पहली कैबिनेट करके विधानसभा भवन निर्माण की घोषणा की थी, उनकी खींची लकीर आज त्रिवेंद्र ने छोटी कर दी है। क्योंकी राजनीतिक रूप से गैरसैंण के लिए सबसे पहले ठोस कदम उठाने की हिम्मत भी बहुगुणा ने ही की थी। 
लेकिन आज इस बड़े फैसले के लिए त्रिवेंद्र सिंह रावत की तारीफ़ करने में न तो कोई कोताही बरती जानी चाहिए और न ही कोई कंजूसी की जानी चाहिए। उन्होंने मीडिया से कहा भी कि मैंने इस घोषणा को बहुत ही गोपनीय रखा और अपने सरकार और संगठन के सहयोगियों से चरचा तक नहीं की। सीधे सदन में जाकर घोषणा कर डाली। यह उनकी “राज” करने की नीति का हिस्सा जरूर हो सकता है लेकिन लोकतंत्र में इस तरह के फैसलों को दूसरे नज़रिये से देखा जाता है। बहरहाल कुछ भी हो फिलहाल उत्तराखंड की सियासत की तपती और छिछली जमीन पर त्रिवेंद्र ने जितनी लम्बी लकीर खींच डाली है उसे छोटा करना असंभव सा लगता है। मगर यह फैसला कहीं न कहीं देहरादून के स्थाई राजधानी बनने का दावा थोड़ा मजबूत होता दिख रहा है। इस बात से इंकार करना नासमझी ही होगी। 


घोषणा के साकार होने का फ़लसफ़ा 

रेत की दीवार खड़ी मुश्किल होता है लेकिन उस पर चढ़ना और भी ज्यादा मुश्किल। जिस घोषणा से त्रिवेंद्र जमीन पर लम्बी लकीर खींचकर निकले है उस घोषणा को जमीन पर उतारना उन्हीं की जवाबदेही है। वर्ना जितनी वाहवाही आज बटोरी है उसके दुष्परिणाम आने में भी समय नहीं लगेगा। चुनाव में अभी दो साल है, इसलिए यह घोषणा चुनावी कतई नहीं है, अब तो सवाल केवल अपनी क्षमताओं के अनुरूप समयबद्ध तरीके से आगे बढ़कर अपनी बात पूरी करने का है। देश में जम्मू कश्मीर में अभी तक दो राजधानियों का कॉन्सेप्ट है। वहां सरकार छह महीने जम्मू से तो छह महीने श्रीनगर से चलती है। जब सरकार जम्मू से श्रीनगर शिफ्ट होती है तो करोड़ो रूपये खर्च होते हैं, वहां पर दोनों स्थान पर राजभवन, मुख्यमंत्री और तमाम मंत्रियो के और सभी ब्यूरोक्रेट्स के आवास और दफ्तर है। जिस दिन सरकार शिफ्ट होती है तो जम्मू और श्रीनगर के रूट को आमजन के लिए प्रतिबंधित होता है। सचिवालय में समीक्षा अधिकारी से लेकर मुख्य सचिव तक सभी अधिकारी कर्मचारी शिफ्ट होते है। हिमाचल और महाराष्ट्र में राजधानी से अलग केवल विधानसभा का सत्र आयोजित होता है। इसलिए जो कांसेप्ट आज समर कैपिटल का उत्तराखंड में आया है वो जम्मू कश्मीर पैटर्न है और यदि इससे कुछ कम हुआ तो घोषणा पर सवाल तो उठेंगे ही त्रिवेंद्र रावत की सियासत के इंडेक्स में जिस तरह से उछाल आया है उसी तरह से नीचे भी गिरेगा। 

फ़िलहाल त्रिवेंद्र को शुभकामनाये

अब पूरी तरह यूएन के हुए राकेश कुमार, सीएम के एडवाइजर भी होंगे

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डॉ राकेश कुमार

भारतीय प्रशानिक सेवा से लिया वीआरएस 
यूएनडीपी के चीफ़ एडवाइजर के साथ ही उत्तराखंड में भी देंगे योगदान

अजित सिंह राठी की कलम से 
बेहतरीन आईएएस अफसरों में से एक उत्तराखंड कैडर के डॉ राकेश कुमार ने भारतीय प्रशासनिक सेवा को अलविदा कह दिया है। डॉ कुमार इस समय यूएनडीपी (यूनाइटेड नेशन डेवलपमेंट प्रोग्राम) में भारत में मुख्य सलाहकार के पद पर कार्यरत है। आईएएस की नौकरी से वीआरएस लेने की उनकी अर्जी को मुख्यमंत्री ने मंजूर तो कर लिया है लेकिन साथ ही डॉ कुमार को उत्तराखंड में अपना सलाहकार भी नियुक किया है। अब वह 65 वर्ष की आयु तक संयुक्त राष्ट्र में सेवाएं दे सकेंगे। 

उत्तराखंड कैडर के 1992 बैच के आईएएस अफसर डॉ राकेश कुमार ने अपना  प्रतिनियुक्ति का समय बढ़ाने का आवेदन किया था, उत्तराखंड सरकार ने तो अनुमति दे दी थी लेकिन केंद्र से स्वीकृति मिलने में हो रहे विलम्ब के चलते कुमार को फैसला लेना था कि वो या तो वीआरएस लेकर पूरी तरह से संयुक्त राष्ट्र के साथ जाय या फिर लौटकर अपने कैडर उत्तराखंड आये। इस क़शमक़श में उन्होंने वीआरएस लेकर यूएन के साथ जाने का फैसला लिया। 31 जनवरी को यूएन द्वारा दी गयी समयावधि खत्म होने और भारत सरकार की मंजूरी नहीं मिलने के बाद डॉ कुमार ने आईएएस की नौकरी से वीआरएस लेने के लिए उत्तराखंड सरकार समक्ष आवेदन किया। जिसे विगत 11 फरवरी को मुख्यमंत्री ने मंजूर तो किया ही लेकिन राज्य के लिए डॉ कुमार का उपयोग करने के लिए उन्हें अपना सलाहकार भी नियुक्त किया। उन्हें ऑनरेरी एडवाइजर नियुक्त किया गया है ताकि संयुक्त राष्ट्र को भी कोई आपत्ति न हो।  इस तरह, सेवा निवृति से पांच वर्ष पहले ही एक ऐसे आईएएस ने देश की इस सुप्रीम सर्विस को छोड़ दिया जो कि खुद शानदार ट्रैक रिकॉर्ड के मालिक रहे है।  

The Additional Secretary (IEC), Shri K.B. Agarwal and the DG, Doordarshan (Prasar Bharti), Shri C. Lalrosanga signed a Strategic Partnership MoU for enhanced awareness generation on Public Health issues, in the presence of the Secretary (H&FW), Shri B.P. Sharma, in New Delhi on December 10, 2015. Shri N.S. Kang, AS&DG (NACO), Smt. Dharitri Panda, JS, Dr. Rakesh Kumar, JS (RCH, IEC) and Shri K. L. Sharma, JS from M/oH&FW along with senior officials from DD are also seen.

पौड़ी, नैनीताल व देहरादून में जिलाधिकारी रहते हुए और शासन में खासतौर पर शिक्षा व आपदा प्रबंधन सचिव रहते हुए जो काम उन्होंने किये, उनका जिक्र आज भी होता है। पिछले वर्ष डॉ कुमार को London School of Hygiene and Tropical Medicine ने “ग्लोबल हेल्थ लीडरशिप प्रोग्राम” के लिए चुना। खास बात उनका चयनित होना नहीं, बल्कि इसकी ख़ासियत यह है कि वर्ल्ड के इस सर्वोच्च संस्थान ने पूरी दुनिया से जिन बारह हस्तियों को चुना उनमे राकेश कुमार एक थे। यहाँ के निदेशक Prof. Peter Piot है जिन्होंने 1976 में इबोला की ख़ोज की थी, जो इस समय UNAIDS के कार्यकारी निदेशक भी है। डॉ कुमार ने इस कार्यक्रम के तहत लन्दन, जिनेवा और कैप टाउन में “ग्लोबल हेल्थ लीडरशिप प्रोग्राम” की ट्रेनिंग ली।  2015 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में संयुक्त सचिव रहते हुए देश भर में टीकाकरण से छूटे बच्चों के लिए मिशन इंद्रधनुष जैसी महत्वाकांक्षी योजना लांच की, जिसका जिक्र प्रधानमंत्री अक्सर अपने सम्बोधन में करते रहे है। यह विश्व में पब्लिक हेल्थ की 12 सर्वाधिक सफल और बड़ी योजनाओं में से एक है।   

Dr Rakesh Kumar, Chief Advisor UNDP India

भाजपा का नया “मुस्तक़बिल”

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बरकरार रही उत्तराखंड की सोशल इंजीनियरिंग 

दो टूक 

अजित सिंह राठी की कलम से 
चर्चाएं अपना वजूद बचाने में कामयाब रही और वरिष्ठ भाजपाई बंशीधर भगत भाजपा के नए सुबाई निज़ाम बने। राज्य गठन के समय स्थापित हुई उत्तराखंड की सोशल इंजीनियरिंग का सीना भी फूलकर 58 इंची हो गया। मसलन, मुख्यमंत्री ठाकुर होगा तो प्रदेश अध्यक्ष ब्राह्मण बनेगा। मुख्यमंत्री गढ़वाल से होगा तो प्रदेश अध्यक्ष कुमाऊं को देना “संवैधानिक” मज़बूरी होगी। नए दौर की भाजपा की वर्जनाएं भी टूटी और 9वीं कक्षा पास 70 साल के बंशीधार भगत युवा दावेदारों के “लश्कर” को पछाड़कर अध्यक्ष की “डिग्री” लेने में कामयाब रहे।
वैसे तो भगत 1996 में यूपी में भाजपा सरकार में राज्य मंत्री थे, लेकिन कांग्रेस की दिग्गज नेता इंदिरा हृदेश को चुनाव हराने के बाद ही लोगों ने ढंग से उनका संज्ञान लिया। अपने चुनाव को छोड़ दे तो बंशीधर कभी किसी बड़े सियासी इम्तिहान से मुखातिब तक नहीं हुए। लेकिन दो साल बाद विधानसभा चुनाव जैसी विशाल परीक्षा के लिए उनका पंजीकरण हो चूका है, अभी से “कोचिंग” नहीं ली तो पास होने के लिए “ग्रेस” के मार्क्स भी कम पड़ेंगे और पूरणचंद शर्मा की तरह समय से पहले भाजपा के किसी अधिवेशन में इस्तीफ़े की पेशकश करना विवशता बन जायेगा। क्योंकि 1989 में नैनीताल (तब नैनीताल-उधमसिंहनगर) का जिलाध्यक्ष बनने के बाद से अब तक संगठन में उन्होंने किसी महत्वपूर्ण पद पर काम नहीं किया है।  
आज प्रदेश भाजपा मुख्यालय देहरादून में दिग्गज भाजपाइयों की मौजूदगी में बंशीधर भगत को उत्तराखंड भाजपा की कमान सौंपने की औपचारिकता पूरी की गयी। बंशीधर दावा लाख दावा करे लेकिन कार्यकर्ताओ में किस तरह से ऊर्जा फूंकेंगे, यह देखने के लिए अभी प्रतीक्षा करने का रास्ता ही एक मात्र विकल्प है। जब भगत का नाम इस पद के लिए पहली बार आया तब तमाम लोगों ने इस पर यकीन करने की जहमत नहीं उठाई। प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में सबसे बाद में प्रतिभाग करने वाले बंशीधर इस प्रतियोगिता को आसानी से जीत गए। चुनौती बहुत है, मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से तक़रीबन 12-14 साल बड़े भगत को संतुलन भी बैठना होगा। मुख्यमंत्री तीसरी बार विधायक निर्वाचित है और बंशीधर भगत सातवीं बार। 1991 से लगातार विधायक निर्वाचित होते आ रहे भगत का कुल राजनीतिक कैरियर 45 साल का है और उन्हें विधायिका की सियासत में प्रदेश में केवल कैंट विधायक हरबंस कपूर ही टक्कर देने की स्थिति में हैं। फिर भी ना जाने क्यूँ भगत के अध्यक्ष बनने से भाजपा के सेंसेक्स में वो उछाल नहीं आ पाया जो विरोधी दलों के खेमों में “एयर स्ट्राइक” कर सके। नेतृत्व के लिए आक्रामकता जरुरी है लेकिन अभी बंशीधर के सियासी तजुर्बे से मुँह मोड़ लेना भी सियासत के माहिर लोगों और विश्लेषकों के लिए अकलमंदी का काम नहीं है। फ़िलहाल भाजपा को अपने नए मुस्तक़बिल पर यकीन करके ही आगे बढ़ना होगा।  

संघ की पसंद ने बनाई राह 

यह तय होने के बाद कि अध्यक्ष कुमाऊं का ब्राह्मण होगा, गढ़वाल के लिए स्पेस समाप्त हो गया था। पार्टी तय कर चुकी थी की अजय भट्ट रिपीट नहीं होंगे और प्रकाश पंत भी अब नहीं है। इसलिए ऐसा कोई बड़ा कुमाऊंनी ब्राह्मण नहीं था जिसका एक्सपोज़र अजय भट्ट और प्रकाश पंत के बराबर हो। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत लालकुआं से पार्टी विधायक नवीन दुमका को प्रदेश अध्यक्ष बनवाना चाहते थे तो कैलाश पंत पार्टी में दिए गए समय और योगदान की पृष्ठभूमि के बल पर अकेले लड़ते हुए सियासी चक्रव्यूह के आठवें द्वार में जा फंसे। जिहोने आठवें द्वार पर साथ देने का वादा किया था वो ओझल हो चुके थे। बाकी जो नाम दौड़ में थे उनका कोई मतलब नहीं रह गया था। खटीमा से दूसरी बार विधायक और मौजूदा प्रदेश उपाध्यक्ष पुष्कर सिंह धामी को सियासी समीकरणों में राजपूत होने का ख़ामियाजा भुगतना पड़ा। इसी उथल पुथल में संघ ने दिल्ली में बंशीधर का नाम पेश कर दिया। जब मुख्यमंत्री को नवीन दुमका में “दम” नहीं दिखा तो उन्होंने भी हवा का रुख देखकर अपनी “मुरली” बंशीधर के लिए बजा दी। इस तरह से रिटायरमेंट की तरफ बढ़ रहे चुनावी राजनीति के पीएचडी होल्डर और शैकक्षिक रूप से 9वीं पास बंशीधर भगत पुन: मुख्यधारा में लौटे। 

दिलचस्प रही अध्यक्षों की कहानी 

राज्य गठन के समय भगत सिंह कोश्यारी भाजपा की संघर्ष समिति के अध्यक्ष थे। गठन होते ही वह अध्यक्ष बन गए लेकिन मंत्री बनने के बाद उन्हें महीने दो महीने में ही अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद पूरनचंद शर्मा को अध्यक्ष बनाया गया लेकिन 2002 का विधानसभा चुनाव हारने के बाद 2002 में ही पार्टी के जयपुर अधिवेशन में इस्तीफ़ा देना पड़ा तो उनके शेष कार्यकाल के लिए मनोहर कांत ध्यानी को बागडोर सौंप दी गयी। लेकिन पार्टी ने फिर निर्णय लिया और 2003 में भगत सिंह कोश्यारी को अध्यक्ष बना दिया। 2007 में पार्टी चुनाव जीत गयी और भगतदा का कार्यकाल भी समाप्त हो गया। चूँकि भुवन चाँद खंडूड़ी मुख्यमंत्री बन गए थे इसलिए इस पद पर कुमाऊंनी ठाकुर की ताजपोशी होनी थी, इसी कर्म में बची सिंह रावत अध्यक्ष बने। लेकिन बची सिंह रावत लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे तो कैबिनेट मंत्री बिशन सिंह चुफाल को अध्यक्ष बनाया गया। इसी बीच खंडूड़ी हटे और निशंक मुख्यमंत्री बने तो उनके लिए चुफाल से बेहतर कोई नहीं हो सकता था इसीलिए बिशनदा को अध्यक्ष पद पर रेगूलर कर दिया गया। 2013 में भाजपा के हारने के बाद नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी अजय भट्ट को मिली तो गढ़वाल के ठाकुर तीरथ सिंह रावत को अध्यक्ष बनाया गया। इस समय मौजूदा मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत तीरथ के सामने अध्यक्ष का चुनाव हार गए थे। इसके बाद दिसंबर 2015 में अजय भट्ट को अध्यक्ष बनाया गया जो आज तक इस पद पर रहे। 

सिलसिलेवार हार और डूबते क्षत्रप

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दो टूक 

अजित सिंह राठी की कलम से 

पिछले चार सालों में भारतीय राजनीति की जो तस्वीर उभरी है उससे कई नए मानदंड स्थापित हुए हैं। 2014 से भी बड़े बहुमत से 2019 में पुन: देश की सत्ता संभाल लेना मोदी की लोकप्रियता का पुख्ता प्रमाण है लेकिन 2017 से पंजाब विधानसभा चुनाव से शुरू होकर अभी अभी झारखण्ड विधानसभा चुनाव तक के हार के बेहद पीड़ादायक राजनीतिक सफ़र में काफी कुछ हाथ से निकल जाना राज्यों में नेतृत्व का बड़ा फेलियर है। अवाम का ऐसा मिज़ाज़ बदला कि राज्यों में सरकार चुनते वक़्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को भी नकार दिया। कई बड़े राज्यों की हार यह बताती है कि पब्लिक मोदी से तो संतुष्ट है लेकिन भाजपा के क्षेत्रीय क्षत्रपों से ऊब चुकी है। केंद्र में भले ही मोदी के सामने कांग्रेस नेतृत्व खड़ा न हो पा रहा हो लेकिन प्रांतों में कांग्रेस के जो क्षेत्रीय सिपहसालार है वो भाजपा के क्षत्रपों पर भारी पड़ रहे हैं। भाजपा जिन राज्यों में विधानसभा हारती आ रही है वहां से एक कॉमन फ़ीडबैक यह है कि मुख्यमंत्री अपने मंत्रियों और विधायकों के बजाय अफसरों को ज़्यादा तवज्जो देते रहे और उन्हीं पर भरोसा करते रहे। संगठन केवल नाम भर का रह गया था और मंत्री/विधायकों की सरकारी सिस्टम में कोई सुनवाई नहीं होने के कारण कार्यकर्त्ता दूर होते गए। हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर, महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस और झारखण्ड में रघुबर दास के खिलाफ इन्हीं बातों को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी थी। ईमानदार सरकार होने का जो ढोल पीटा जा रहा था, उसे पार्टी के ही विधायक अपने समर्थकों के बीच झुठला दे रहे थे। और, उस कथित ईमानदारी को जनता ने भी चुनाव के वक़्त सिरे से ख़ारिज कर दिया।

 
पंजाब विधानसभा चुनाव मार्च 2017यहाँ चुनाव हुए तो भाजपा गठबंधन की सरकार को धूल चटाते हुए कांग्रेस ने सत्ता हथिया ली। भाजपा को 117 में से मात्र तीन और सहयोगी दल SAD 15 सीटों पर सिमट गया। भाजपा और सहयोगी दल से ज्यादा सीटें आम आदमी पार्टी ने जीत ली तो भाजपा के लिए और भी चिंता बढ़ गयी। पंजाब विधानसभा में कांग्रेस ने 77, आप ने 20, शिरोमणि अकाली दल ने 15 और भाजपा ने 03 सीटें जीती। यहाँ पर भाजपा यह भांपने में नाकाम हो गयी कि सुखबीर सिंह बादल से लोग बेहद नाराज है। 
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राजस्थान विधानसभा चुनाव दिसम्बर 2018इस बड़े राजनितिक महत्व वाले प्रदेश में भाजपा की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से लोग इतने नाराज हुए कि विधानसभा चुनाव में “मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं”  जैसा नारा दे दिया। उधर भाजपा के विद्रोही हनुमान बेनीवाल ने अलग पार्टी बनाकर पार्टी को दो दर्जन सीटों पर चुनाव हवा दिया। भाजपा का यहाँ चुनाव में 89 विधानसभा सीटों का नुकसान उठाना पड़ा। भाजपा नेतृत्व पर कई सालों से वसुंधरा को हटाने का दबाव बना हुआ था लेकिन कोई नतीजा नहीं निकलता देख पब्लिक ने खुद फैसला करके भाजपा को सत्ता से बाहर कर दिया। यहाँ पर कुल 199 (एक सीट पर चुनाव नहीं हुआ था) में से कांग्रेस ने 99, भाजपा ने 73 सीटें जीती और राजस्थान कांग्रेस की झोली में जा गिरा। 

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मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव दिसम्बर 2018 भाजपा मध्य प्रदेश में भी पिछड़ रही थी, लेकिन पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने शिवराज सिंह चौहान पर पूरा भरोसा करके गलती कर दी। यदि शिवराज के बेटियों का मामा बनकर और महिलाओ को राखी बांधकर ही सत्ता मिलती तो राजनीति बहुत आसान हो गयी होती। जनता ने भाजपा को नकार कर यहाँ भी कांग्रेस को सत्ता सौंपी। भाजपा ने इस राज्य में 56 सीटों का नुकसान उठाकर 109 सीटें जीतीं। जबकि कांग्रेस 56 सीटें बढाकर 114 सीटें पाईं। इस तरह से यह बड़ा प्रदेश भी भाजपा के हाथ से निकल गया। 
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छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव दिसम्बर 2018 इस राज्य में एक दशक से ज्यादा समय से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज रमन सिंह को सत्ता से बाहर का ऐसा रास्ता दिखाया कि भाजपा के पास नेता प्रतिपक्ष का दावा करने लायक भी विधायक नहीं बचे। 34 सीटों के नुकसान पर भाजपा मात्र 15 सीटों पर सिमट गयी और कांग्रेस 68 सीटें ले उडी। पब्लिक की नाराजगी को भाजपा यहाँ भी नहीं भांप सकी और यह राज्य भी हाथ से निकल गया। 

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हरियाणा विधानसभा चुनाव अक्टूबर 2019 हरियाणा में गैर जाट का कार्ड खेलने का खामियाजा भुगतना पड़ा। हरियाणा में जिन जाटों को दरकिनार कर भाजपा राजनीति कर रही थी उन्हीं जाटों (दुष्यंत चौटाला की पार्टी जेजेपी) की बैशाखी के सहारे बमुश्किल इज्जत बचाकर सरकार बना सकी। अबकी बार 75 पार का नारा नहीं चला और 7 सीट खो कर भाजपा 40 पर सिमट गयी। वहीँ पिछले चुनाव में 15 पर अटकी कांग्रेस इस चुनाव में 31 का आंकड़ा छू गयी और वह भी केवल भूपेंद्र सिंह हुड्डा दम पर। राजनीतिक विश्लेषकों ने यहाँ तक कहा कि यदि हुड्डा को चुनाव की कमान दो तीन महीने पहले मिल गयी होती तो सियासी बजी पलट गयी होती। 

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महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव अक्टूबर 2019 इस वाणिज्यिक राज्य महाराष्ट्र में भी भाजपा ने गैर मराठा कार्ड खेला और उसकी सहयोगी शिव सेना शुरू से ही कहती रही कि इस बार शिब सैनिक मराठा मानुस ही मुख्यमंत्री होगा। हुआ भी वही। भाजपा को यहाँ शिवसेना की जिद और शरद पवार के रजनीतिक तजुर्बे ने करारी मात दी। यहाँ भी आम भाजपाई के देवेंद्र फडणवीस को पसंद नहीं करने के बावजूद भाजपा ने चुनाव में उन्हें ही मुख्यमंत्री घोषित कर दिया। नतीजा सभी के सामने है, आज महाराष्ट्र में शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन की सरकार चल रही है और भाजपा किनारे खड़ी है। इस चुनाव में भाजपा को 106 सीट मिली जबकि पिछले चुनाव में 122 सीटें थी।

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झारखण्ड विधानसभा चुनाव दिसम्बर 2019 हरियाणा की तर्ज पर भाजपा ने यहाँ भी बड़े समुदाय को दरकिनार कर ओबीसी नेता रघुबर दास को मुख्यमंत्री बनाया था। जिस राज्य में आधे से अधिक आबादी आदिवासियों की हो वह पर उनके साथ अन्याय करके दूसरे समुदाय को आगे बढ़ाने की प्रतिक्रिया में भाजपा का विजय रथ थम गया और झारखण्ड मुक्ति मोर्चा-कांग्रेस-आरजेडी गठबंधन ने 49 सीटें जीत ली। जिस गैर आदिवासी चेहरे रघुबर दास पर दांव लगाया वही चुनाव हार गया। ईमानदार नेता सरयू राय भाजपा को बताते रहे कि सरकार ठीक नहीं चल रही है, लेकिन उनकी एक नहीं सुनी। सरयू भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री थे, छोड़कर बागी हुए और मुख्यमंत्री के सामने चुनाव लड़कर जीत गए। भाजपा यहाँ 25 सीटों पर सिमट गयी।   

मुख्यमंत्रियों से मुँह फेरती ‘जीत’ 

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त्वरित टिप्पणी 

अजित सिंह राठी की कलम से 

यदि आप थोड़ी भी राजनीतिक समझ रखते हैं तो उत्तराखंड और झारखण्ड में समानताओं का आंकलन करना  जटिल काम नहीं है। मसलन, दोनों राज्यों का एक ही दिन गठन होना, गठन के बाद लम्बे समय तक राजनीतिक अस्थिरता के चक्रव्यूह में फंसे रहना, नेताओं की महत्वाकांक्षाओं की अत्यधिक रफ़्तार होना और कई मुख्यमंत्रियों का चुनाव में हार जाना। राजनीतिक तिगड़मबाजी का आलम यह रहा कि गठन के बाद से अब तक उत्तराखंड को नौ और झारखण्ड को छह मुख्यमंत्री मिल चुके हैं। यह काफी चिंताजनक था कि जो मुख्यमंत्री अपने कार्यकाल में तमाम कीर्तिमान स्थापित करने का दावा ठोकते रहे, जनता उन्हें ठुकराती रही। झारखण्ड के मौजूदा मुख्यमंत्री रघुबर दास की हार के बाद दोनों राज्यों में मुख्यमंत्रियों की हार की कहानी फिर सामने आ गयी है। 

उत्तराखंड : 

उत्तराखंड में जब वर्ष 2002 में पहला विधानसभा चुनाव हुआ तो प्रदेश के पहले ही मुख्यमंत्री स्वामी नित्यानंन्द देहरादून शहर की एक सीट से चुनाव हर गए, और वह हार उनके राजनीतिक जीवन के लिए ऐसा बड़ा नुकसान करके गयी कि स्वामी फिर से राजनीति की मुख्यधारा में नहीं लौट सके। हालाँकि जब वह चुनाव हारे तब मुख्यमंत्री नहीं थे। उस समय भगत सिंह कोश्यारी राज्य के सीएम थे। 

इसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में तो और भी बड़ा राजनीतिक हादसा पेश आया। भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव में जीत के लिए खंडूड़ी को जरुरी बताया वो कोटद्वार विधानसभा सीट से चुनाव हार गए और पार्टी एक वोट से राज्य में सरकार बनाने से वंचित रह गयी। उसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में खंडूड़ी जीत तो गए लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में जब भी मुख्यमंत्रियों की हार का जिक्र होगा तब तब जनरल खंडूड़ी का नाम भी जुबां पर आएगा। इसके बाद 2017 के चुनाव में तो तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत हरिद्वार की हरिद्वार ग्रामीण और उधमसिंह नगर जिले की किच्छा विस सीट से ऐसे प्रतिद्वंदियों से चुनाव हार गए जिनकी उम्र हरीश के राजनीतिक तजुर्बे से भी कम थी। उत्तराखंड की राजनीति के लिए मुख्यमंत्रियों की हार बेहद गम्भीर मसला थी लेकिन लोग हर बार भूलकर आगे बढ़ते गए। 

19 साल में नौ मुख्यमंत्री 

उत्तराखंड बनने के बाद 19 वर्षो में नौ मुख्यमंत्री मिले। स्वामी नित्यानंद, भगत सिंह कोश्यारी, नारायण दत्त तिवारी, जनरल बीसी खंडूड़ी, रमेश पोखरियाल निशंक, जनरल बीसी खंडूड़ी, विजय बहुगुणा, हरीश रावत के बाद अब त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री है। 

झारखण्ड :  

बतौर मुख्यमंत्री रघुवर दास के सामने आज उस तिलिस्म को तोड़ने की चुनौती है, जिसे पिछले 19 सालों में झारखंड का कोई पूर्व मुख्यमंत्री नहीं तोड़ सका। झारखंड में लोगों का भी मिजाज कुछ ऐसा रहा है कि जो नेता भी सीएम की कुर्सी पर विराजमान रहा, उसे कभी न कभी चुनाव में जनता ने हार का स्वाद चखाया है. अब तक राज्य का कोई भूतपूर्व सीएम इस रिकॉर्ड को तोड़ नहीं पाया है. इसलिए रघुवर दास के सामने इस मिथक को तोड़ने की चुनौती थी।बता दें कि जब रघुवर दास सीएम नहीं थे तो 2014 में वे जमशेदपुर पूर्व सीट से लगभग 70 हजार वोटों से विधानसभा चुनाव जीते थे लेकिन अब चुनाव हार गए है। 

‘गुरु जी’ ने तो ऐसी शिकस्त खाई…. 

झारखण्ड के सभी पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन, मधू कोड़ा, हेमंत सोरेन विधानसभा चुनाव हारे हैं। लेकिन शिबू सोरेन जैसी हार किसी की नहीं हुई। 27 अगस्त 2008 को मधु कोड़ा ने सीएम पद से इस्तीफा तो तत्कालीन जेएमएम सुप्रीमो और गुरु जी के नाम से विख्यात शिबू सोरेन राज्य के मुख्यमंत्री बने। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार उन्हें 6 महीने में विधानसभा का सदस्य बनना जरुरी था। मुख्यमंत्री रहते हुए शिबू सोरेन तमाड़ सीट से उप चुनाव में उतरे अपने प्रतिद्वंदी राजा पीटर ने 8,973 वोट से हरा दिया. राजा पीटर को जहां 34,127 मत मिला तो शिबू सोरेन को 25,154 मत से संतोष करना पड़ा। बस फिर क्या था, चुनाव हारने के बाद शिबू सोरेन को सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा। 

19 साल में 6 मुख्यमंत्री

झारखंड बने 19 साल गुजर चुके हैं. इस दौरान 3 बार विधानसभा चुनाव हुए और अस्थिरता के दौर से गुजरे झारखंड में 6 राजनेता मुख्यमंत्री बने. बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन, मधू कोड़ा, हेमंत सोरेन और रघुवर दास को झारखंड का सीएम बनने का सौभाग्य मिला है. इस बार चौथी बार झारखंड विधानसभा के लिए चुनाव हो रहा है। जब 15 नवंबर 2000 को झारखंड का गठन हुआ था तो उस समय अविभाजित बिहार के विधानसभा चुनाव में जीते सदस्यों के सहारे ही झारखंड की पहली विधानसभा का गठन हुआ था। 

दून ने लिखी एक जन आंदोलन की इबारत

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मानव श्रंखला के पास से गुजरते मुख्यमंत्री   

अजित सिंह राठी की कलम से 

प्रकृति के हरे भरे ताशीर को निगल रही प्लास्टिक के विरोध में ऐसा कार्यकम दून घाटी में पहले न देखा न सुना, आज सुबह यह कार्यक्रम जब अदभुत तरीके से एक विशाल रूप धारण कर गया तब लोगों और आलोचकों की समझ में आया कि यह ख़ालिश कार्यक्रम ही नहीं है, जीवन बचाने के लिए एक सामाजिक आंदोलन की शुरुआत है। ऐसा लग रहा था कि यह नगर निगम देहरादून का नहीं किसी बड़े किसी बड़े सियासी दल का कार्यक्रम है। वैसे भी इस कार्यक्रम को मील का पत्थर बनाने में नगर निगम के राजनीतिक तंत्र ने भी दलीय भावना से ऊपर उठकर काम किया। 


एक शहर, पचास किलोमीटर लम्बी मानव श्रंखला, सवा लाख से भी ज्यादा लोग, व्यवस्थित कार्यक्रम और लेशमात्र भी कोई ऐसी बात नहीं जिससे कार्यक्रम का स्वरूप बिगड़ता हो। दाद देनी पड़ेगी नगर आयुक्त व आईएएस विनय शंकर पांडेय की जिन्होंने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और मेयर सुनील उनियाल गामा को भरोसे में लेकर एक इतनी लम्बी लकीर खींच दी कि भविष्य में इस तरह का कार्यक्रम करवाने से पहले एक नहीं सौ बार सोचना पड़ेगा। चूँकि अमूमन इस तरह का कार्यक्रम कोई बड़ा राजनीतिक दल ही कर सकता है सरकारी हाकिम नहीं। ऐसा मैकेनिज़्म तैयार किया कि महानगर के एक छोर से दूसरे छोर तक स्कूली बच्चे, बूढ़े, जवान, अधेड़, महिला पुरुष, युवा, सरकारी कर्मचारी, तमाम आईएएस आईपीएस व अन्य बड़े अफसर, जन प्रतिनिधि, राजनीतिक व सामाजिक कार्यकर्त्ता सड़क पर उतरकर मानव श्रंखला में न केवल शामिल हुए बल्कि बुलंद आवाज में कह उठे “अब प्लास्टिक नहीं” इतनी लम्बी लकीर ऐसे ही नहीं खिंच गयी, इसके पीछे महीनों की मेहनत, एक ठोस कार्ययोजना और उसके सतत प्रभावी अनुश्रवण के लिए बहाया गया पसीना है जिसने इस फसल को लम्बे समय तक सींचा था। कार्यक्रम की सफलता, सड़कों पर उत्तरी भीड़ का जज्बा आज मुख्यमंत्री के चेहरे पर तैरती मुस्कान के भाव को और गहरा कर दे रहा था। और मुस्कान की यह गहराई काफ़िला बढ़ने के साथ ही बढ़ती जाती थी। गामा से पहले रहे मेयर भी सोच रहे होंगे कि इस सामाजिक चेतना को जगाने का प्रयास उन्होंने क्यों नहीं किया, नगरायुक्त की कुर्सी को पनिशमेंट मानने वाले नौकरशाह भी सदमे में होंगे।    

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इस जन चेतना आंदोलन की पृष्ठभूमि

विगत 27 अगस्त को मेयर और नगरायुक्त प्लास्टिक पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगाने के लिए शहर से जुड़े तमाम संगठनों की बैठक बुलाकर इसका उदघोष किया। 11 से 20 सितम्बर तक सभी पार्षद अपनी टीम के साथ अपने वार्डों में गए और स्वैच्छिक पॉलीथिन दान कार्यक्रम चलाकर 83 क्विंटल प्लास्टिक लोगों के घरों से एकत्र किया। शहर के स्कूलों में 15 से 30 सितम्बर तक प्लास्टिक बैंक बनाकर बच्चों को अपने अपने घरो से प्लास्टिक मंगवाई और 63 क्विंटल प्लास्टिक एकत्र की। 02 अक्टूबर से शहर में कपड़े के बैग का वितरण शुरू किया गया और 40 हजार घरो में इसका वितरण हुआ। असर यह हुआ कि महानगर के कचरा निस्तारण के लिए लगे ठोस अपशिष्ट निस्तारण प्लांट के पर्यावरणीय वैज्ञानिक ने इस बात की रिपोर्ट निगम को दी है कि पिछले अगस्त से अब तक प्लास्टिक के कचरे में 65 फ़ीसदी की कमी आई है।

चुनौती भी है 

निसंदेह कार्यक्रम लाजवाब हुआ। लेकिन यदि इस कार्यक्रम की सफलता की खुमारी जल्दी ही नहीं उत्तरी और नगर निगम अपने लक्ष्य को पूरा करने में नहीं जुटा तो समझ लीजिये सड़क पर निगम को मिला यह जनादेश व्यर्थ जायेगा। कार्यक्रम के कामयाब होने की आतिशबाजी के बजाय अपनी ऊर्जा को गंतव्य के कोस नापने में लगाना होगा। अनुश्रवण का तारतम्य टूटा तो जनता जनार्दन जवाब मांगेगी।

उत्तराखंड का एक और नौकरशाह शीर्ष पर

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एनएचएआई के चेयरमैन बने आईएएस सुखबीर सिंह संधू 

अजित सिंह राठी की कलम से 
अभी तक केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय में अपर सचिव के पद पर तैनात 1988 बैच के आईएएस सुखबीर सिंह संधू को केंद्र सरकार ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (NHAI) का चेयरमैन नियुक्त किया है। उत्तराखंड के लिए यह बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि संधू का मूल कैडर उत्तराखंड ही है।  संधू एक साफ सुथरे और शानदार ट्रैक रिकॉर्ड के मालिक है और पंजाब व उत्तराखंड में किये गए कार्यों में उनकी प्रतिबद्धता और निष्पक्षता से अफसरशाही भली भांति परिचित है। उनकी छवि बहुत ही कड़क अफसर की है और दबावमुक्त होकर काम करना उनके स्वभाव में है। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके ऊपर भरोसा जताकर वो टास्क दिया है जिसके माध्यम से देश भर में विकास को पंख लगने है। खास बात यह है कि सचिव रैंक की इस पोस्ट पर संधू को अपर सचिव रहते हुए तैनाती दिया जाना किसी उपलब्धि से कम नहीं है। यहीं बात उन पर प्रधानमंत्री के भरोसे को दर्शाती है।   यूपी के समय सृजित जिला उधमसिंह नगर के पहले जिला मजिस्ट्रेट से लेकर संधू ने वो तमाम महत्वपूर्ण पद ओहदे संभाले हैं जिनके लिए बड़े स्तर पर लॉबिंग होती है। 2011 तक पंजाब में इंटरस्टेट डेपूटेशन पर रहे संधू वहां लगभग तीन साल तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के सचिव भी रहे और जैसे ही उत्तराखंड लौटे तो तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवन चंद खंडूड़ी ने उन्हें अपना सचिव नियुक्त किया। इसके बाद वह विजय बहुगुणा और हरीश रावत के मुख्यमंत्री रहते उनके प्रमुख सचिव भी रहे थे। करीब पांच साल पहले वह केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्य्रालय में तत्कालीन एचआरडी मिनिस्टर स्मृति के साथ चले गए। इत्तेफ़ाक़ देखिये,  प्रतिनियुक्ति का समय पूरा होने पर अब जब वह अपने मूल कैडर उत्तराखंड में लौटने की तैयारी कर रहे थे तब प्रधानमंत्री ने उन्हें एक महत्वपूर्ण और व्यापक जिम्मेदारी देकर दिल्ली में ही रोक लिया। वैसे ईमानदार अफसरों पर हमेशा विलम्ब के साथ काम करने और अपनी छवि के सामने काम की क़ुरबानी लेने का आरोप लगता है लेकिंन संधू के साथ यह ख़राब संयोग नहीं है। उनके NHAI के चेयरमैन बनने का फायदा उत्तराखंड को भी मिलेगा, क्योंकि यहाँ भी बहुत सारे नेशनल हाईवे के प्रोजेक्ट्स आधे अधूरे पड़े हैं। 

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…. और थम गयी ब्यूरोक्रेसी में उपजी कश्मक़श 

राज्य की ब्यूरोक्रेसी में सुखबीर सिंह संधू का अहम स्थान है। मौजूदा मुख्य सचिव उत्पल कुमार के रिटायर होने के बाद संधू उत्तराखंड  मुख्य सचिव के पद लिए प्रबल दावेदार थे। उनके प्रतिनियुक्ति से वापस आने की सूचना से ही नौकरशाही में गहमागहमी थी, अब उनके नहीं आने की स्थिति से तमाम तरह की अटकलें भी ठहर गयी है।   

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दुनिया के टॉप बारह में उत्तराखंड का नौकरशाह 

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अजित सिंह राठी की कलम से

दुनिया में ऐसे लोगों की बड़ी संख्या हैं जिन्होंने तमाम तरह के हथकंडे अपना कर कथित सफलता पाई और शौहरत पाने के लिए मुनादी भी खूब की। लेकिन कुछ शख़्सियत ऐसी भी हैं जिन्होंने लक्ष्य प्राप्ति के लिए संघर्ष के नए मानदंड स्थापित कर एक बड़ा मुकाम हासिल किया और अपनी संघर्ष गाथा को भौतिकवाद और दुनिया की चकाचौंध से पूरी तरह दूर रखा। उत्तराखंड कैडर के 1992 बैच के आईएएस अधिकारी डॉ राकेश कुमार को London School of Hygiene and Tropical Medicine ने “ग्लोबल हेल्थ लीडरशिप प्रोग्राम” के लिए चुना। खास बात उनका चयनित होना नहीं, बल्कि इसकी ख़ासियत यह है कि वर्ल्ड के इस सर्वोच्च संस्थान ने पूरी दुनिया से जिन ग्यारह लोगों को चुना उनमे राकेश कुमार एक है। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि यहाँ चयनित होने के लिए आवेदन करना पड़ता है, खुद को उस लायक साबित करना पड़ता है लेकिन डॉ कुमार को वहां के वरिष्ठ वैज्ञानिक ने नॉमिनेट किया और फिर उनका आवेदन लेने London School of Hygiene and Tropical Medicine ने समयावधि ख़त्म होने के बाद उनके लिए दो दिन पोर्टल खोलकर उनसे आवेदन कराया। यहाँ के निदेशक Prof. Peter Piot है जिन्होंने 1976 में इबोला की ख़ोज की थी, जो इस समय UNAIDS के कार्यकारी निदेशक भी है। Prof Piot ने दुनिया में सर्वाधिक कार्य। यहाँ पर इंटरेक्शन करने वाली अन्य हस्तियों में भी Dr David Heymann-Executive Director, Communicable Diseases WHO जैसे नाम शामिल है।

यहाँ ग्लोबल हेल्थ डिप्लोमेसी जैसे विषय पर रणनीति बनती है, यहाँ पर विश्व स्तरीय खोज होती है, इसलिए यहाँ विरले लोग ही जाते हैं। मौजूदा समय में संयुक्त राष्ट्र के यूएनडीपी में एडिशनल कंट्री डायरेक्टर काम कर रहे डॉ कुमार “ग्लोबल हेल्थ लीडरशिप प्रोग्राम” की लन्दन में एक सप्ताह की ट्रेनिंग लेकर लौटे है और आगे की ट्रेनिंग जिनेवा और कैप-टाउन में होगी। विशेष बात यह है कि डॉ कुमार वैसे भी चिकित्सा शिक्षा की पढाई करके सिविल सर्विस में आये और यहाँ उन्होंने नेशनल इंटरनेशनल  स्तर के कई बड़े अवार्ड भी जीते हैं।

चित्र : Prof Kara Henson, Dean of LSHTM के साथ डॉ राकेश कुमार

 

यहाँ यह उल्लेख करना भी आवशयक है कि यह वही राकेश कुमार है जिन्होंने 2015 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में संयुक्त सचिव रहते हुए देश भर में टीकाकरण से छूटे बच्चों के लिए मिशन इंद्रधनुष जैसी महत्वाकांक्षी योजना लांच की, जिसका जिक्र प्रधानमंत्री अक्सर अपने सम्बोधन में किया करते है। यह विश्व में पब्लिक हेल्थ की 12 सर्वाधिक सफल और बड़ी योजनाओं में से एक है।  2009 में एक सर्वे हुआ  जिसमे देश के 61 प्रतिशत बच्चों का सम्पूर्ण टीकाकरण होना पाया गया था। 2013  में फिर सर्वे हुआ और पाया कि देश में 65 प्रतिशत बच्चों का ही टीकाकरण हुआ था। यानि एक साल में वृद्धि की दर एक प्रतिशत थी। 2015 में जब बतौर संयुक्त सचिव डॉ राकेश कुमार ने मिशन इंद्रधनुष योजना लांच की तो इसका इम्पैक्ट आया और शोधकर्ता मान रहे हगाई कि 2020 तक इस योजना से पूरे देश में 90 प्रतिशत बच्चे ऐसे होंगे जिनका सम्पूर्ण टीकाकरण हो चुका होगा। मसलन, 2009 से 2013 तक चार प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई लेकिन जब मिशन इंद्रधनुष योजना लागू हुई तो 2020 तक पंद्रह प्रतिशत की बढ़ोतरी होने की पूरी सम्भावना है। इससे भी खास बात यह थी कि ये छूटे हुए बच्चे वो थे जो अर्बन स्लम, ईंट भट्टे और नदियों के किनारे खनन करने वाले और रियल एस्टेट में भवन निर्माण के प्रोजेक्ट्स में मजदूरी करने वाले मजदूरों के हैं जिन पर किसी का ध्यान नहीं जाता है।

चित्र : निदेशक पीटर पिओट (मध्य में बैठे हुए) के साथ डॉ राकेश कुमार व विश्व से चुनी गयी अन्य ग्यारह हस्तियां

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By : Dr Rakesh Kumar IAS, Addl. Country Head UNDP

I am humbled to share that I have been chosen as one of 12 Global Health Leadership Fellows (I, being a Gates Fellow) from 10 different nationalities at London School of Hygiene Tropical Medicine which is a 10-month on the job fellowship with three residential weeks; one week each at London, Geneva and Cape Town. The first week at London was fully packed with interactions/discourses with top Global Health leaders including Dr Peter Piot-Director LSHTM, Dr David Heymann-Executive Director, Communicable Diseases WHO, Dr. Jennifer Dixon-CEO of the Health Foundation UK, Dr. Charlotte Watts-Chief Scientific Advisor DFID, and Sir Liam Donaldson-Former Chief Medical Officer/Chair of Independent Monitoring Board overseeing Polio Eradication Initiative at WHO, and the programme Coordinator Dr. Claire Beyntun at LSHTM. This programme focusses mainly on leadership and diplomacy in global health. Dr Piot very rightly mentioned that ‘Easy solutions are over. Technical and political instruments are need of the hour to achieve the global health mandate’. Besides, the cross learning from fellow leaders, sharing of Indian best practices including Polio eradication (2014) and MNTE (2015) remained at the centre-stage of the residential week at London.

 

हिलटॉप! नॉन स्टॉप….एक था मद्य निषेध विभाग

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दो टूक 
अजित सिंह राठी की कलम से 
 
उत्तर प्रदेश में मद्य निषेध नाम का एक विभाग है। वैसे तो राज्य बनने के बाद उत्तराखंड ने समस्त कानून, विधियां और पूरा सिस्टम यूपी का ही लागू किया था लेकिन कुछ “बुराइयों” को छोड़ने में ज्यादा विलम्ब नहीं किया। जैसे कि उत्तराखंड में मद्य निषेध विभाग अब इतिहास की बात ही समझो। अब उत्तराखंड में कोई इसका नामलेवा नहीं है। यहाँ सरकार डेनिस की चिंता करती है यहाँ सरकार हिलटॉप के लिए फिक्रमंद है लेकिन आज तक किसी मुख्यमंत्री, मंत्री या अफसरों के मुँह से मद्य निषेध का नाम आज तक नहीं सुना। 
मद्य निषेध विभाग की कल्पना राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने की थी। उत्तर प्रदेश में एक राज्य मद्य निषेध अधिकारी एक उप राज्य अधिकारी और सात क्षेत्रीय अधिकारीयों के आलावा हर जिले में एक एक मद्यनिषेध अधिकारी तैनात है। एक बानगी देखिये, जब उत्तराखंड बना तो मद्य निषेध विभाग को समाज कल्याण विभाग में मर्ज़ कर दिया गया। जब राज्य बना तब हर जिले में जिला मद्य निषेध अधिकारी होते थे जो सीमित संसाधनों से ही सही लेकिन लोगों को शराब नहीं पीने के लिए जागरूक करते थे। कुछ दिन बाद मद्य निषेध अधिकारी सेवा निवृत हो गए और उनका काम समाज कल्याण अधिकारीयों को दे दिया गया। 
दिलचस्प बात देखिये कि मद्य निषेध अधिकारी रिटायर हुए तो नई भर्ती ही नहीं हुई और आबकारी विभाग में आयुक्त से लेकर जिलों में हकीमों की फ़ौज खड़ी हो गयी। अब अंतर देखिये, आबकारी विभाग का हर साल राजस्व बढ़ाने का लक्ष्य तय होता है और मद्य निषेध का कोई लक्ष्य नहीं। अभी हाल ही में केंद्र सरकार ने नेशनल एक्शन प्लान फॉर ड्रग्स डिमांड डिडक्शन के लिए 2.19 करोड़ रूपये समाज कल्याण को मिले है। देखते है कि ऊंट के मुँह में जीरे जैसी इस राशि से कितना परिवर्तन होता है। ताज्जुब ये है कि केंद्र ने थोड़ी ही सही, धनराशि दी तो लेकिन उत्तराखंड सरकार ने कभी सोचा तक नहीं है।
अब बात करते है हिलटॉप की। जिस राज्य में शराब बिक्री के लिए राष्ट्रीय राजमार्गों को डी-नोटिफाई कर दिया जाय, जिस राज्य में चारधाम यात्रा मार्ग पर शराब की दुकानें सजाई जाय, तो हिलटॉप और डेनिश को लेकर क्या हल्ला करना। अब कोई सरकार मोबाइल वैन से मदिरा बेचे या फिर देवप्रयाग में हिल के टॉप पर ब्रांड तैयार कराये, क्या फर्क पड़ता है।